Friday, September 23, 2011

Aaj Inqalaab Mat Lana

आज इंक़लाब मत लाना


सारी दौड़, धपत, धूल, धूप से बाहर आ जाओ
किसी घने पेड़ की छाँव में एक खटिया बिछाओ
कलम हाथ उठाओ या फिर बाँसुरी बजाओ
धरती की गोद में लेटकर आकाश के गुण गाओ

आएँगे तुम्हे खटिया से उठाने बहुत से शुभ चिंतक
कुछ तुम्हारे, कुछ देश के, कुछ विश्व को भी बचाने वाले
बोलेंगे 'उठो! Don’t be an escapist
How can you tolerate this situation?
The country needs you now
Get up for the sake of the nation!”
चलो हाथ उठाओ, कदम बढ़ाओ
नारे लगाओ, आरोप बरसाओ
मोमबति जलाओ, सरकार गिराओ
कुछ तो शर्म करो
सारा संसार बिखर कर टूट रहा है
कम से कम खटिया पर बैठ
गाने तो ना गाओ
चलो चलकर इंक़लाब लाओ"

मत पूछना उनसे
शांति की अम्मी का नाम अशांति कब से
मत पूछना यह भी कि आक्रोश के बीजों से
अमन कैसे उपजाएँ गे वे
और भूल कर भी मत दौहराना
वह सवाल जो सदियों पहले
ईसा मसीह ने पूछा था
मेरी मगदलिन पर पथर उठाने वालों से
कि है कोई यहाँ बिल्कुल बेकासूर तुम में?
मत कहना यह सब
क्योंकि उतेजना के कान नहीं होते
कोई नहीं सुनेगा तुम्हारा सवाल
कोई नहीं देगा तुम्हे जवाब

पर दोस्त तुम आज इंक़लाब मत लाना
तुम कोई मादक सा गीत गाना
मुझे मालूम है और तुम्हे भी कि
Your songs will not change the world
But then, everyone doesn’t have to change it
Ignore the angry footsteps
marching towards better futures
Blank out the noise
The dissatisfaction, the moral outrage
Straggler, sit you down under the trees
And enjoy the breeze
Savour this world, just for today

दोस्त तुम सजदे में सर झुकना
आज तुम कोई दुआ गाना
तुम आज इंक़लाब मत लाना
तुम आज इंक़लाब मत लाना

3 comments:

Anuradha Goyal said...

Beautiful Manjul...

batalaland said...

beautiful indeed! :)

Julia Dutta said...

However, after Aatish Taseer moan and groan on the 'ruinous’ impact of the English language on Indian literature by authors writing in English from India, I wonder what the response to a mix of languages, or scripts, would be. However, brilliant and true or our times, herenow, the poem written in 2011, perhaps means that poems are immortal and timeless, by nature. I must admit, I would have loved to have an Indian English translation of the same poem, following the end, because, then the readership would presumably go up. I am forever baffled by talent in prose and poetry in which you seem to excel Manjul.