Tuesday, November 3, 2009

Mrigtrishna

मृगतृष्णा


दश्त में चले जा रही हूँ
ever hopeful, ever striving
मेरा रिश्ता पानी से नहीं
प्यास से है
मेरा नाता मिलन से नहीं
उसकी आस से है
सम्बंध अब जान से नहीं
हर इक साँस से है
मोह जीवन से नहीं
जीने के अहसास से है
शुक्रगुज़ार हूँ उन चाहतों की
जिन्होने तड़पाया है
सर आँखों पर हैं वह उम्मीदें
जिन के सहारे रेगिस्तान
पार हो पाया है
without the mercy of mirages
कदम नहीं उठते,
फ़ासले नहीं टलतें

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दश्त में चले जा रही हूँ
धड़कनों को बुलंद रखे
ऐसे अगर मर भी जाऊं
तो कोई गिला नहीं
चाहत के सिवा अब मेरा
और कोई सिलसला नहीं
without the mercy of mirages
कदम नहीं उठते,
फ़ासले नहीं टलतें
झूठी ही क्यों न हो मेरी आस
है वो मेरे दिल के कितने पास
सिर्फ़ हमारे सपने ही तो अपने हैं
और कौन है जिस पर है
विश्वास

Thursday, April 16, 2009

Rishtey

रिश्ते


यह तो हमारा भ्रम है
कि हम रिश्ते
बनाते और तोड़ते हैं
सच तो यह है
कि रिश्ते
हमें तोड़ते और बनाते हैं

गलत है यह सोच
कि रिश्ते हमें
हँसाते या रुलाते हैं
रिश्ते तो आईना हैं
बस हमें अपनी शक्ल
दिखलाते हैं

यह तो हमारा भ्रम है
कि हम रिश्ते निभाते हैं
सच तो यह है
कि आखरी दम तक
रिश्ते हमारा साथ
निभाते हैं

रिश्ते ही वह सीढ़ी हैं
जिस पर चढ़कर
हम भगवान के घर जाते हैं

Friday, October 10, 2008

Nahin Chahiye

नहीं चाहिए


नहीं चाहिए यह बुद्धि मुझे,
नहीं यह विवेक
किस काम के हैं ज़हन और ज़मीर
गर सब का दाता है एक?

यह बता मुझे, ए खुदा
सब तरफ़ तू ही है ना छाया,
यह सारा जग तेरी ही तो है माया
फ़िर धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय
का स्वांग यह तूने क्यों रचाया
यह सही और ग़लत का भेद
तूने मेरे सर क्यों जमाया?

बता मुझे
क्यों चढूँ पहाड़ कोई
जब वादी में भी तू है
क्यों करूँ मौजों से मुक़ाबला
जब साहिल पर भी तू है
क्यों बनूँ विजयी मैं
जब शिकस्त में भी तू है
क्यों खोजूँ हरदम उजाले मैं
जब रातों के साए में भी तू है?
क्यों निभाए मोहब्बतें कोई
जब रुखसत और तनहाई में भी तू है
क्यों करें कोई दवा दारू
जब दर्द में भी तू है
क्यों करें हम कोई प्रयास
आलस में भी तो तू है
जियें क्यों हम शांति-अमन से
जब आतंकवाद में भी तू है
बता ना मौला
क्या मुनाफ़ा और क्या नुकसान
जब सारा हिसाब-किताब ही तू है?

सच, वापिस लेले यह बुद्धि और विवेक
नहीं यह मेरे किसी काम के देख
देना है कुछ तो बदले में भेज देना
अपार प्रेम और अटूट संवेदना

डूब जाऊँ उसमें और डुबा दूँ जहाँ तेरा
डूब जाऊँ उसमें और डुबा दूँ जहाँ तेरा

Wednesday, September 24, 2008

यह पंखा

कभी रोता है कभी करहiता है
विरहा का ना जाने कौन सा गीत
छत से उल्टा लटका यह पंखा
बार बार मुझे सुनाता है
ना कोई राजा है ना कोई रानी है
बस छोटी सी इसकी कहानी है
मौसम की तपिश में
सपनो के जल जाने की
ज़िंदगी की राह चलते चलते
दूर अपने से खुद को पाने की
गर्म कमरे में ठंडी साँसे लेता
रोता सिसकाता है यह पंखा
Switch it off
put on the AC, dammit
Or get up, go out walking
can't lie there staring at the ceiling
listening, for godsake, to a fan talking
Yes, get up and go out walking
मैं तो बाहर चली जाती हूँ
पर अंदर सर के
घूमता जाता है यह पंखा

Thursday, February 14, 2008

Immortality

रात ग़ालिब आए ख्वाब मॅ
मैने कहा "अरे चचा तुम यहाँ कैसे?"

बोले बिटिया Immortality isn't at all
what its cut out to be
बड़ी निकम्मी चीज़ है यह
न जाने कहाँ कहाँ नहीं जीना पड़ता
तुम जैसे उभरते शायरों के ख्वाबों मॅ
फटी पुरानी किताबों मॅ
सरकारी खातों और हिसाबों मॅ
टूरिस्ट गाइड के ज्वाबों मॅ

I said “You must be joking
आप भी मज़ाक कर रहे हैं ना"

बोले मज़ाक कहाँ तौबा
कभी जी के देखना ज़रा
मोहब्बत कि घिसी पिटी बातों मॅ
आशिक़ों कि झूंटी सौगातों मॅ
हिज्र और विसाल दोनो की रातों मॅ
टूटते दिलों और ज़ज्बातों मॅ
उफ्फ

मेरी सलाह मानो तो अच्छे से जीना
और वक़्त पर मर भी जाना
कुछ नही रखा मरने के बाद जीने मॅ
जब दिल ही नही धड़कता हो सीने मॅ
Believe me my dear
sometimes i feel like an old tart
walking endlessly on new streets.
Perish immortality
I could kill for a good night's sleep.

Monday, August 27, 2007

Kuchh Na Bolenge




Sometimes silences speak, or weep, or bleed. One such moment captured and pinioned into a poem upon this page.

Saturday, August 25, 2007

Tara Bola



The lodestar speaks to the traveler, in this poem.